श्रद्धांजलि
कवि,विश्व शांति दूत ,शिक्षक, पत्रकार ,साहित्यकार , व्यंग्यकार को विनम्र श्रद्धांजलि
श्री प्रभाकर चौबे का जन्म श्रृग्य ऋषि के तपोभूमि सिहावा में एक अक्टूबर 1935 में हुआ । वे रायपुर के राष्ट्रीय विद्यालय के प्राचार्य पद से सेवा निवृत हुए थे । वे शिक्षकों के हित एवं उत्थान के लिए संघर्ष रत रहा करते थे । म0प्र0 माध्यमिक शिक्षा मण्डल के सक्रीय सदस्य थे ।
वे राष्ट्रीय प्रगति शील लेखक संघ के सदस्य व अध्यक्ष रहे । मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सदस्य, छत्तीसगढ़ हन्दी साहित्य सम्मेलन के संरक्षक थे ।
वे अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता परिषद के कार्यकारिणी सदस्य , विश्व शांति आंदोलन के जुझारू कार्यकर्ता थे।
कल दिनांक 21 जून 2018 को 83 वर्ष की आयु में संसार को छोड़कर बिदा हो गये । वे कुछ दिनों से अस्वस्थ थे । वे एम्स में भर्ती थे । अस्पताल में मिलने गये शुभ चिंतकांे से कहा था ‘मोर जनम अस्पताल में होय रिहीस फेर कबहो अस्पताल नी गेंव अब अस्पताल में आए हावव तब मोला ये आखिरी लगथे।‘
वे 15 वर्षों से रायपुर , बिलासपुर एवं जगदलपुर से प्रकाशित होने वाले सांघ्य दैनिक हाइवे चैनल का कुशलता पूर्वक संपादन कर रहे थे ।
उनकी रचना किसके किसके , कितने कितने तीसरा मोर्चा, पहले रेलगाड़ी से श्रेणी हटाइए सर , इस बार यह सब तय था , तीसरा मोर्चा पर गुस्सा क्यों?, एक उपवास होता - एक हुआ ,अंगूठा चुसते हुए बच्चा सो जाता है , मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान में एक , भा0ज0पा0 की वक्र दृष्टि कर्नाटक सरकार पर , महाराजा के चैथे राज्यारोहण पर प्रजा को एक पैसा बख्शीश , राजनीति में शांत रस काल चल रहा , राजनीति का समाजशास्त्रीय अध्ययन ,ये कृतियाॅं उनके सम समायिक चिंतन को स्पष्ट दर्शाता है । विशेषतः उनका आलेख देशबंधु दैनिक में प्रकाशित होता था जहां वे लगभग अपने जीवन का आधा भाग समर्पित कर दिया था ।
उन्हें मायाराम सुरजन स्मृति लोक चेतना अलंकरण से अलंकृत किया गया था।
नया जमाना -नई चढ़ोतरी देशबन्धु दीपावली विशेषांक 1991 पृष्ठ क्र0 31
प्रायोजित बर्थ डे देशबन्धु दीपावली विशेषांक 1995 पृष्ठ क्र0 143
सेवा निवृत हुए - समाजोपयोगी हुए देशबन्धु दीपावली विशेषांक 1996 पृष्ठ क्र0 187
सारे पशु गांधी की बकरियाॅं देशबन्धु दीपावली विशेषांक 1997 पृष्ठ क्र0 50 इत्यादि उनकी रचना संग्रहणीय हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में वे अपनी लेखनी से समाज के विषमता को रेखांकित करते थे । उनका जगत छोड़कर जाना अपूर्णनीय क्षति है ।
मैं उनकी लेखनी की सुगंध को प्रस्तुत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूॅं , प्रस्तुत है:- सेवानिवृत हुए - समाजोपयोगी हुए व्यंग्य रचना से ‘इस माह सेवानिवृत हुआ । किसी महंत का सतसंग किया होता तो वे कहते - “ सेवा से कभी निवृत हुआ जाता है , बच्चा । अंतिम सांस तक सेवा करना , यही देह धेरे का धर्म है । “ पता नहीं अंतिम सांस तक कैसे सेवा की जाती है मध्यवर्गीय आदमी की तो रोज ही सांस उखड़ती है । अंतिम सांस तक सोचता है - लड़की शादी हो गई होती । लड़के की पक्की नौकरी नहीं है । पत्नि किस लड़के के पास रहेगी ....................
ईश्वरेच्छा बलियसी - ऊॅं शांति ,ऊॅं शांति ,ऊॅं शांति।।
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